क्या प्रेम के लिये कोई विशेष दिन, अथवा उत्सव होना चाहिये?
निश्चित ही नहीं, यह तो शाश्वत है, जो किसी भी प्राचल (मानक) पर अनिर्भर है.
पर यहां मैं उस प्रतीक और उसमें छुपे भाव की बात करना चाहता हूं, जो "वेलेंटाइन डे" में अंतर्निहित है.
जिस प्रकार देश की आजादी में स्वयं का बलिदान करने वाले वीर सपूतों को स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस पर हम याद करते हैं. हालांकि उनका बलिदान हर दिन, हर वक्त प्रासंगिक है, लेकिन यहां एक दिन विशेष को प्रतीक मानकर हम उनके प्रति अपना आदर एवं प्रेम वगैरह अभिव्यक्त करते हैं.
जिस तरह भाई बहनों के बीच का रिश्ता किसी दिन अथवा त्यौहार का मोहताज नहीं होता, फिर भी, रक्षाबंधन का त्यौहार भाई बहनों के स्नेह का प्रतीक होता है, और प्रतीकात्मक रूप से यह दिन काफी विशेष होता है.
जिस प्रकार भगवान सार्वभौमिक एवं शाश्वत है, तब भी हम भगवान की प्रतिमा बनाकर विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से उसे पूजते हैं, और उस मूर्त के माध्यम से हम वास्तविक ईश्वर तक पहुंचने का भाव रखते हैं. यहां भाव प्राथमिक है, माध्यम द्वितीयक.
एक सुप्रसिद्ध हिंदी फिल्म "विवाह" के एक गाने की पंक्तियां हैं, मेरे Papa अक्सर उसे उद्धृत करते हैं,
"राधे कृष्ण की ज्योति अलौकिक, तीनों लोक में छाई रही है,
भक्ति विवश एक प्रेम पुजारन, फिर भी दीप जलाई रही है!"
ठीक उसी प्रकार प्रेम का प्रतीक यह दिन विशेष है. और भारतीय धर्म-दर्शन में तो प्रेम के अनगिनत उदाहरण हमें मिलते हैं, राधा-कृष्ण, राम-सीता, शिव-पार्वती.. और भी अनेकों उदाहरण..
मैं किसी भी फूहड़ता एवं अमर्यादित व्यवहार का समर्थन कभी नहीं करता, न करूंगा. लेकिन उस प्रतीक में अंतर्निहित भाव वास्तविक है, जिसे "वेलेंटाइन डे" के रूप में मनाया जाता है.
✍️ Prof. Abhishek Vaniya
That's right prof.
ReplyDeleteGreat read!
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